चुनावी विश्लेषण:अटवाल के लिए आसान नहीं है चुनावी डगर

जालंधर(विशाल कोहली)
लोकसभा चुनाव से पहले ही जालंधर लोकसभा सीट से अकाली- भाजपा गठबंधन के उम्मीदवार चरणजीत सिंह अटवाल द्वारा जीत की लय बनाने की कोशिश अभी से नाकाम नजर आने लगी है। पंजाब में इस बार सियासी फिजायें बदली हैं। अकाली दबदबे वाले इस प्रदेश में इस बार यहां कांग्रेस पार्टी सत्ता पर काबिज है। यही वजह है कि पिछले विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस की नजर इन लोकसभा चुनाव में भी बड़ी जीत हासिल करने पर है। अकाली दल की कमान सुखबीर बादल के हाथों में आने के बाद छोटे बादल कुनबे को अपने साथ चलाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुये हैं। एक समय ऐसा भी था जब पंजाब के ग्रामीण इलाकों में जहां अकाली दल का बोलबाला था तो शहरों में भाजपा को समर्थन मिलता। अब हालात बदल गये हैं और दोनों ही दलों के सामने कई चुनौतियां हैं।
मौजूदा चुनावों में मुद्दों की बात करें तो अकाली दल सरकार में 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान और प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी बादल परिवार व शिरोमणी अकाली दल के लिये सिरदर्द साबित होगा।
भारतीय जनता पार्टी की बात करे तो अब तक उन्हें शहरी इलाको की पार्टी के तौर पर बोला जाता था, मगर इन कुछ दिनों से भाजपा का वोटबैंक शहरी क्षेत्रों में आश्चर्यजनक तरीके से कम होता जा रहा है। भाजपा शहरों में लगातार अपना जनाधार खोती जा रही है। गांव और शहर दोनों स्तरों पर भाजपा के कमजोर होने के कारण अटवाल को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। ग्रामीण वोट बैंक कांग्रेस की तरफ जाना भी अटवाल की संभावित हार का सबसे बड़ा कारण बन सकता है।
बता दें कि पंजाब में सबसे कमजोर पार्टी के तौर पर भाजपा का नाम देखा जाता है। जालंधर लोकसभा क्षेत्र में भाजपा नेताओ की तथकथित कम सक्रियता और चुनाव के दौरान ही दिखने के कारण भाजपा को वोट देने वाले मतदाताओं की संख्या दिन ब दिन घटती जा रही है। भाजपा की घटती लोकप्रियता के चलते अब भाजपा का साइलेंट वोटर भी धीरे-धीरे कांग्रेस की तरफ खिसकता जा रहा है।ऐसे में अटवाल के लिए अपना रास्ता तय करना आसान नहीं होगा। भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, इस पर सीधी बात करना मुश्किल है, लेकिन आज के हालात देखकर इशारों को समझा जा सकता है।

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