परीक्षाओं में नकल, एक सामाजिक अभिशाप

आजकल परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला है। छात्र अपने-अपने स्तर से इसकी तैयारी में लग गए हैं लेकिन दुखद यह है कि पिछले कुछ वर्षो से परीक्षाओं की शुचिता पर सवाल उठते रहे हैं। देश भर में ऐसे कई केंद्र देखने और सुनने में मिलते हैं, जिन्होंने नकल कराकर इस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। ऐसा नहीं है कि सरकार ने नकल रोकने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए, परंतु नकल माफियाओं ने इसकी धज्जियाँ उड़ा दी। वह अपने कारनामों से छात्रों के साथ साथ देश का भविष्य भी अधर में डालते रहे हैं। छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किसी भी दशा में कभी भी न माफ करने वाला अपराध है। शिक्षा ही वह पूंजी है जो देश के लिए योग्य नागरिक तैयार करती है और ये नागरिक देश का नाम का नाम रोशन करते हैं। यदि शिक्षक परीक्षा के दौरान अन्दर हो रही गतिविधियों पर नजर रखें तो बाहरी हस्तक्षेप नही हो सकता। यदि शिक्षक अपनी डयृटी के पति समर्पण भाव से कार्य करते है तो परीक्षाओं को नकल रहित सम्पन्न करवाया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि नकल माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें सलाखों के पीछे डाले।
अच्छे समाज की कल्पना तभी की जा सकती है जब बच्चों को बुनियादी शिक्षा सही तरीके से दी जाए। नकल अभिशाप को मिटाने के लिए जन जागरूकता बेहद जरूरी है।
मनोज त्रेहन, जालंधर

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