बिल्ली के भाग्य से छींका बार बार नहीं टूटता

जालंधर(विनोद मरवाहा)
बिल्ली के भाग्य से कुछ साल पहले साहब का छींका क्या टूटा चाल ही बदल गई। कल तक जिनके साथ काम करते थे, पार्टी की बैठकों में भाग लेते थे आज उन्हीं के साहब बन गए। अब साहब सीधे मुंह बात भी नहीं करते हैं। दरअसल, छींका टूटने से पहले तक जिस कुर्सी को सलाम ठोका करते थे,अब उसी पर बैठने का मौका मिल गया है। हालांकि यह स्थाई नहीं ,नए साहब की तैनाती होते ही फिर से पुराने दिन लौटेंगे।
मसला जुड़ा है एक राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी से। जिला भर में साहब अपनी ही पार्टी के साथियों के बीच चल रहे मनमुटाव को लेकर चर्चा में हैं। साहब के आने से पार्टी में कई गुट बन गए हैं। सामने तो नहीं लेकिन पीठ पीछे एक दूसरे की कमियां गिनाने में ये गुट कोई भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। आरोप तो यह भी लगाया जा रहा है कि साहब ने पार्टी को इस हद तक प्रदूषित कर दिया है कि वफादार व मेहनती पार्टी कार्यकतार्ओं का काम करना मुश्किल हो गया है। इसलिए जितनी जल्दी साहब को हटाया जाएगा, उतना ही पार्टी के लिए अच्छा होगा। पीठ पीछे साथी यही कह रहे हैं कि चार दिन की चांदनी है। बड़े साहब की छुट्टी होते ही इनकी भी छुट्टी तय है। जिस दिन इनकी जगह किसी नए साहब की तैनाती हो जाएगी, भाई जी फिर से पार्टी कार्यकतार्ओं को सलामी ठोकने लगेंगे और साथ ही सभी के साथ जमीन पर बैठेंगे।

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