दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ने श्री हनुमान मंदिर मे किया कार्यक्रम का आयोजन

जालंधर (विनोद मरवाहा)
गीता जयंती के उपलक्ष्य में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान और युवा ब्राह्मन सभा द्वारा श्री हनुमान मंदिर आदमपुर मेंं एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें संस्थान की और से सर्व श्री आशुतोष महाराज ती की शिष्या साघ्वी अदिति भारती जी ने गीता के आगमन का महत्व समझाते हुए कहा कि गीता प्रभु श्रीकृष्ण के श्री मुंख से प्रकट हुई वे रसघार है जिसमें स्नान कर हम कर्माे के बन्धनो से अजाद हो सकते हैँ कर्म योद्धा बन सकते है, भगवान अर्जुन को समझा रहे है कर्म ही पूजा है, अर्जुन शत्रु पक्ष में खडा है अपने ही सगे सम्बन्धियों को, भाई भतीजे, गुरूजन, पितामह आदि स्वजनो के समूह को देखता है उसके हृदय में उथल पुथल मच जाती है, तोह जागृत हो उठता है और वे बोल पड़ता है नही केशव, नही माधव नही नही मुजसे ये यु नही होगा, मेरा अंग अंग शिथिल कहो रहा है मुख थी सूख रहा है, मेरे हाथों से गांडीव छुट रहा, अपनो की छाती पे बान चलाने की शक्ति मुझमें नही है, नही चाहिए वो विजय वो राज्या जो अपनो के शवों पर खडा हो, इसलिए हे गोविंद में युद्ध नही करूगा,

साध्वी जी ने बताया की जब भगवान कृष्ण ने जब देखा कि मोह ने उनके पार्थ की कर्तव्य निष्ठा को ग्रस लिया है तो जो उसे समझाते हुए प्रभु के मुख से श्री वचनो के रूप मे गीता प्रस्फुटित हुई, जब कर्तव्य का प्रतीक गांडीव उसके हाथो से छुटता जा रहा था तब भगवान श्री कृष्ण ने अनेको उत्साहपुर्व विचार प्रदान करते हैं, उसे धर्म युद्धलडने के लिए पुन: उत्साहित करते हैँ क्यों के अध्यात्म किस इन्सान को भीरू नही बनाता किन्तु इसका अर्थ ये भी नही है कि अध्यात्म हमें हिेंसक बनाता है, अध्यात्म हमें हमारे कर्म पथ पर अर्गसर होने की प्ररेणा देता है, प्रत्येक कर्म को पुजा तुल्य बनाता है, भगवान कह रहे हैं तु युद्ध भी कर और सुमिरन भी कर उसे धर्म के कार्य के लिए ऐसे प्रेरित करते हैँ, लेकिन वे कौन सी विधी है जिससे युद्ध भ्री किया जा सकता है और सुमिरन भी यही गीता का सार है, जब हम भी जीवन के छोटे छोटे युद्ध को लडते हुए थक जाते है तो हमें भी यही सूत्र अपनाना होगा जिसने अर्जुन को असके जीवन काल के सबसे कठिन दौर में न केवल सहारा दिया था, अपितु उसके सिर पर विजय का सेहरा भी बांधा था

उसके अंतहकरन में ब्रह्मज्ञान को प्रकट कर उस नाम को जिसे गीता में अव्यकत अक्षर कहा गया है, इसे शब्दों में व्यकत नही किया जा सकता ये हमारे घट में निरंतर चल रहा है भगवान कृष्ण जैसे पूर्ण गुरू ही इसे प्रकट कर हमें जीवन युद्ध लडने और सुमिरन करने की युक्ति बता सकते हैं जैसे अर्जुन को बताई।

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