
वार्ड नंबर 6: “जब जिम्मेदार ही गैर-जिम्मेदार हों, तो पार्टी का ग्राफ़ गिरना तय है”
जालंधर/विनोद मरवाहा
कहते हैं नेता चुनाव हारकर भी जनता की सेवा करते हैं। पर वार्ड 6 के हालात देखिए—यहाँ तो राजनीति शब्द की परिभाषा ही बदल गई है। उनकी राजनीति का मतलब है— गुटबाज़ी का फूल खिलाना और पार्टी के ग्राफ़ को खुद अपने हाथों गिराना।
वार्ड में गड्ढों से भरी सड़कें, टूटी नालियां और बिजली की आंख-मिचौली जैसे मुद्दे अब इस नेता की प्राथमिकता में नहीं हैं। उनकी प्राथमिकता है—सोशल मीडिया पर फोटो खिंचवाना और पार्टी दफ़्तर में “मैं सबसे वफादार” की गारंटी देना। नतीजा यह है कि जनता के दिल में पार्टी की इमेज नीचे गिर रही है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये जिम्मेदार लोग खुद को वार्ड का इंचार्ज बताते हैं, लेकिन असल में ये वो इंचार्ज हैं जो वार्ड में पार्टी की मजबूत नींव में दीमक बन चुके हैं। नगर निगम चुनाव के वक्त बड़े-बड़े वादे करते थे—“अगली बार वार्ड बदल देंगे”—शायद उनका मतलब था, वार्ड की सूरत नहीं, पार्टी का वोट बैंक बदल देंगे! आज वार्ड का माहौल कुछ ऐसा है जैसे टीम का कप्तान खुद गोलकीपर बनकर अपने ही गोल में बॉल मार रहा हो। उनका शेड्यूल भी बड़ा प्रेरणादायक है—सुबह फोटोशूट, दोपहर गुटबाज़ी, शाम को पार्टी के मुख्य कार्यालय में अपनी पीठ थपथपाना, और रात को विपक्ष की आलोचना।
अगर यही हाल रहा, तो अगली बार वार्ड में पार्टी का ग्राफ़ इतनी तेजी से गिरेगा कि गिरते-गिरते सीधा विपक्ष की गोद में आ बैठेगा।












































