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श्री कृष्ण मुरारी मंदिर, गोपाल नगर जालंधर को अपनी निजी सम्पति समझ बैठे हैं कुछ अधार्मिक, मूर्ख व नासमझ लोग !

जालंधर/विनोद मरवाहा
श्री कृष्ण मुरारी मंदिर, गोपाल नगर जालंधर के कुप्रबंधन को लेकर एक नया विवादित मुद्दा इन दिनों सोशल मीडिया पर बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है। यह एक ऐसा एक जटिल मुद्दा है जिसमें मंदिर के पास आने वाले चढ़ावे, दान और मंदिर की पवित्र भूमि पर बनी 54 दुकानों के तथाकथित गलत इस्तेमाल, जैसे कि किसी के व्यक्तिगत लाभ के लिए सबलेट करना भी शामिल है। बता दें कि सबलेटिंग के लिए कानूनी आवश्यकताओं और नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण है और सबलेटिंग के लिए इसके मूल प्रबन्धक की सहमति की आवश्यकता होती है। ऐसे में अगर यह कहा जाए कि कुछ अधार्मिक व नासमझ लोग इस मंदिर को अपनी निजी सम्पति समझ बैठे हैं तो कोई भी गलत बात नहीं होगी।
वर्तमान में मंदिर को सुचारु रूप से चलाने के लिए कोई भी संवैधानिक मंदिर प्रबंधक कमेटी नहीं है। साल 2015 के बाद कमेटी का चुनाव नहीं करवाया गया है जबकि मंदिर सविंधान के मुताबिक हर तीन साल बाद चुनाव करवाना अनिवार्य है। बताया जा रहा है कि साल 2012 में हुए चुनाव के समय मंदिर को सुचारु रूप से चलाने के लिए लगभग 70 सेवादारों को चुना गया था। तब यह भी तय किया गया था कि अगर मंदिर कार्य से सबंधित कोई भी राशि 5000/ रुपयों से अधिक होगी तो उसका भुगतान करने से पहले बैठक बुला कर सभी से सर्वसम्मिति लेनी होगी जबकि इस निर्णय की पिछले दस साल से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और अपने चहेतों को खुश करने या निजी लाभ लेने के लिए मंदिर में दान के व किराये के रूप में एकत्रित हो रही धनराशि का तथाकथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया जा रहा । यही बस नहीं साल 2015 में संवैधानिक तौर पर भंग हो चुकी कमेटी को तत्कालीन प्रधान व सेक्ट्ररी आज भी मंदिर के सदस्यों को नोटिस निकल कर कमेटी से बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं। कानून के इन अंधों को अब कौन समझाए कि जब अभी तक नए चुनाव ही नहीं हुए तो यह अधिकार आपको किस मूर्ख ने दिया है।
यहाँ यह बताना भी जरूरी है कि मंदिर किसी व्यक्ति या परिवार की निजी संपत्ति नहीं होता, बल्कि यह समुदाय या देवता का होता है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय समय पर यह स्पष्ट किया है कि मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन और रखरखाव आमतौर पर मंदिर के पुजारी, मंदिर प्रबंधक कमेटी या ट्रस्टियों द्वारा किया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से यह समुदाय व देवता का है।
आने वाले दिनों में शहर के सभी हिन्दू नेताओं व धार्मिक संस्थाओं से संपर्क कर मंदिर से सबंधित दुकानों के सबलेट का मुद्दा जल्द ही प्रमुखता से उठाया जाएगा। इस बाबत अगर मंदिर के तत्कालीन प्रधान व सेक्ट्ररी अपना पक्ष रखेगें तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।