
पटाखा बिक्री: जगह तय करने का वादा, मैदान अब भी खाली, व्यवस्था के नाम पर बरती जा रही है लापरवाही
जालंधर/विनोद मरवाहा
दिवाली नजदीक आते ही पटाखा व्यापारियों में मार्केट लगाने की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं, लेकिन इस बार प्रशासन के सामने जगह अलॉट करने को लेकर समस्या खड़ी हो गई है। पहले बर्लटन पार्क में पटाखा मार्केट लगती थी, पर इस बार वहाँ स्पोर्ट्स हब बनने के कारण मार्केट लगना संभव नहीं है।
देखा जाए तो दिवाली आने में बस कुछ ही दिन बचे हैं, लेकिन पटाखा व्यापारियों की हालत देखकर लगता है कि प्रशासन ने उनके त्योहार मनाने का कोई विशेष “अनूठा तरीका” खोज लिया है — इंतजार कराइए, परेशान करिए और फिर मुस्कराकर कह दीजिए, “व्यवस्था चल रही है।” जगह अभी तक तय नहीं हुई है। न कोई स्पष्ट निर्देश, न कोई समयबद्ध योजना। ऐसे में व्यापारियों के सामने दो ही रास्ते बचे हैं — या तो बिना जगह के दुकान सजाएँ और प्रशासन की कार्रवाई झेलें, या फिर घर बैठकर ग्राहक के सवालों का जवाब दें।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि व्यापारियों की उपेक्षा का खुला प्रदर्शन है। त्योहार व्यापारियों के लिए सबसे बड़ा अवसर होता है। महीनों की तैयारी, माल की खरीद, परिवार की उम्मीदें — सब दांव पर लगा होता है। लेकिन जिनके कंधों पर त्योहार की रौनक टिकी है, उनके साथ ऐसा व्यवहार होना दुखद ही नहीं, शर्मनाक भी है।
दिवाली केवल रोशनी का पर्व नहीं, रोज़गार का भी उत्सव है। पटाखा व्यापारियों की दुकानें बंद रहीं तो न केवल उनका नुकसान होगा, बल्कि ग्राहकों के पास भी सीमित विकल्प रह जाएंगे। ऐसे में प्रशासन का यह कहना कि “जगह तय की जाएगी” कितनी बार सुनाया जा चुका है — लेकिन मैदान अब भी खाली है।
कई व्यापारी कर्ज लेकर माल खरीद चुके हैं। कुछ ने अग्रिम भुगतान कर दिया है लेकिन उन्हें न तो अब तक पटाखों की बिक्री के लिए न तो अभी जगह मिली है और न ही किसी ने उनके संकट को समझा है। यह कैसी प्रशासनिक संवेदनहीनता है कि त्योहार सिर पर है, फिर भी व्यापारियों की दिक्कतों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा? क्या त्योहार सिर्फ सजावट और शोभा तक सीमित है?
समय आ गया है कि प्रशासन केवल घोषणाएँ न करे, बल्कि जमीन पर काम करे। साफ़ जगह का आवंटन, समय पर लाइसेंस, सुरक्षा प्रबंध और आवश्यक सहयोग दिया जाए। त्योहार की तैयारी कोई दिखावा नहीं — यह रोज़मर्रा के श्रम, जोखिम और उम्मीदों का परिणाम है। व्यापारियों को उपहास नहीं, सहारा चाहिए।
यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो दिवाली की रोशनी फीकी पड़ेगी — और इसका दोष किसी पटाखे पर नहीं, प्रशासन की उदासीनता पर जाएगा।












































